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हमारे देश में रेल सार्वजनिक परिवहन का ऐसा माध्यम है जो हर वर्ग की जरूरतों को अपने स्तर पर पूरा करती है| यह न केवल परिवहन का सबसे सस्ता माध्यम है वल्कि लंबी दूरी की यात्रा के लिए इससे विश्वनीय सवारी और कोई नही है| देश भर में रेलगाड़ियों के सञ्चालन एवं उनसे सम्बंधित तमाम दायत्वों के निर्वाह की जिम्मेदारी रेल मंत्रालय व रेलवे बोर्ड की है| हर वर्ष आम बजट से पहले रेल मंत्रालय अपनी आय-व्यय का लेखा-जोखा रेलवे बजट के द्वारा संसद में पेश करता रहा है| यह परंपरा बानवे वर्षो से जारी रही है| लेकिन अब केंद्र सर्कार ने इस परंपरा को समाप्त कर रेल बजट को आम बजट में शामिल करने का फैसला किया है| सर्कार का तर्क है की आम बजट में रेल बजट का हिस्सा काफी घटकर सिर्फ 6 प्रतिशत रह गया है इसीलिए यह फैसला लिया गया है| गौरतलब है की 1924 में जब पहला स्वन्त्र रेल बजट पेश हुआ था तो इसका आम बजट में हिस्सा 70 प्रतिशत था| इसीलिए पहली नजर में तो यह फैसला उचित ही लगता है लेकिन इस फैसले से क्या हासिल होगा अभी कहना मुश्किल है|
बहरहाल, भारत जैसे देश में जहाँ तमाम महकमे अपने दायित्वों के निर्वाह में कोताही करते नजर आते हैं या फिसड्डी साबित होते हैं भारतीय रेल की उपलब्धियां कम चमत्कारी नही रही हैं|

रेल बजट को आम बजट में शामिल करने के बड़े फैसले का संज्ञान लेते हुए प्रस्तुत है भारतीय रेल की कार्येप्रणाली पर केंद्रित विचार परिक्रमा का यह अंक|

संपादक
शरद गोयल

 
 
 
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